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भारत संधान की वैबसाइट पर आपका स्वागत है। हम पिछले कुछ समय से भारत-संधान नामक पत्रिका निकाल रहे हैं। इस पत्रिका का मुख्य उद्देश्य भारतीय चिन्तन से आपका परिचय कराना और उस चिन्तन को आगे बढ़ाना है। भारतीय चिन्तन से आपको रुबरु कराने के लिए हम वेद, उपनिषद, गीता, शिक्षा आदि पर कार्य कर रहे हैं।

संधान संस्कृत का शब्द है जिसका अर्थ है समझना और सुधारना। संधान में दोनों ही बातें शामिल हैं – समझना भी और सुधारना भी, अर्थात् गहरी खोज करके जो सत्य ज्ञात हो उसके अनुसार अपने लिए और समाज के लिए कुछ सकारात्मक कार्य करना।
हम बिना समझे किसी चीज़ को सुधार नहीं सकते। एक घड़ी को सुधारने के लिए आवश्यक है कि हम पहले जानें कि वह कैसे बनी है और कैसे काम करती है। भारत को सुधारने का प्रयास करने के पहले हमें भारत की प्रकृति को समझना होगा। और देशों की अंधी नकल करके हम न तो भारत को समझ सकते हैं और न ही उसे सुधार सकते हैं।
आज भारत के सभी प्रबुद्ध व्यक्तियों को देश को सुधारने की आवश्यकता महसूस हो रही है। पिछले सौ-दो सौ वर्षों में अनेक सामाजिक आंदोलन समाज को सुधारने के लिए चले। स्वतंत्रता के लिए हमारा संघर्ष केवल राजनैतिक आज़ादी के उद्देश्य को लेकर ही नहीं था। उस संघर्ष में लगे हुए नेता मृत भारत को पुनर्जीवित करना चाहते थे। हमारे स्वतंत्रता आन्दोलन में भारत की आत्मा की खोज एक बड़ी प्रेरणा शक्ति थी। गोपालकृष्ण गोखले, बालगंगाधर तिलक, श्री अरविन्द, बिपिनचन्द्र पाल, लाला लाजपतराय, सुभाषचन्द्र बोस, चक्रवर्ती राजगोपालाचारी, महात्मा गांधी, डा. राजेन्द्र प्रसाद आदि नेता केवल भारत को परतंत्रता से मुक्त कराने के लिए ही संघर्ष नहीं कर रहे थे। वे भारत की प्राचीन संस्कृति को आधार बनाकर एक पुनर्जागरण का अभियान चलाना चाहते थे। और ये वे लोग थे जो पश्चिम के आधुनिक विचारों से पूरी तरह परिचित थे और मानते थे कि न केवल भारत का अपितु संसार का भावी विकास प्राचीन भारतीय विचारों के आधार पर ही हो सकता है।

भारत आन्तरिक जीवन के बारे में खोज करने में अग्रणी रहा है। पर आज के समय में भारत को भी प्राचीन भारतीय ऋषियों द्वारा शताब्दियों की गहरी साधना से खोजे गए सत्य को एक बार फिर से समझने की आवश्यकता है। उन खोजों के परिणामों का संबंध मनुष्य की प्रकृति और उसके भविष्य से है और इसलिए वे हम सभी के लिए प्रासंगिक हैं। यह वैबसाइट भारतीय विचारों से परिचय, और आधुनिक संदर्भ में उन विचारों के और आगे विकास के लिए प्रस्तुत की जा रही है।

वैबसाइट के मुख्य अंग निम्नलिखित हैंऱ

भारत-संधान पत्रिका. यह मासिक पत्रिका पिछले 21 मास से नियमित रूप से प्रकाशित हो रही है। पत्रिका के मुख्य केन्द्रबिन्दु निम्नलिखित हैंऱ

धर्म. जब वेद और उपनिषद काल में भारतीय धार्मिक चिन्तन की नींव पड़ी थी तब किसी भी धार्मिक संप्रदाय का उदय नहीं हुआ था। उस समय का चिंतन ही भारतीय धार्मिक परंपरा आधार है। हम सभी संप्रदायों से ऊपर उठते हुए भारतीय चिन्तन को उसके सच्चे आध्यात्मिक रूप में प्रस्तुत कर रहे हैं।

भाषा. भारतीय ऋषियों की सबसे बड़ी खोज भाषा के बारे में है। उनके अनुसार प्रत्येक भाषा का प्रत्येक शब्द प्रतिक्षण ब्रह्म से आता है। वास्तव में भारत की धार्मिक-आध्यात्मिक साधना मन को शान्त कर भाषा के मूल स्रोत तक जाने पर आधारित है। पत्रिका में हम आचार्य भर्तृहरि के वाक्यपदीय के आधार पर भारतीय भाषाविषयक गहन चिन्तन से परिचित हो रहे हैं।

शिक्षा. आजकल की शिक्षा-पद्धति के विकल्प के रूप में भारतीय चिन्तन पर आधारित शिक्षा-पद्धति के विकास के लिए तर्कसंगत और अनुभव-सिद्ध विचार प्रस्तुत किए जा रहे हैं।

नवीन विज्ञान और दर्शन. पत्रिका के द्वारा भारतीय चिन्तन और आधुनिकतम विज्ञान के बीच समन्वय की दिशा में उभरते बिन्दुओं पर उच्च कोटि के वैज्ञानिकों के लेख प्रस्तुत किए जा रहे हैं।

अन्य देशों के मनीषियों के विचारों का परिचय. संसार के अनेक देशों में ऐसे मनीषी हुए हैं जिनका चिन्तन भारतीय चिन्तन के बहुत निकट है। पत्रिका में ऐसे मनीषियों के लेख दिए जा रहे हैं।

संस्कृत पाठ. भारतीय चिन्तन को समझने के लिए संस्कृत का कुछ ज्ञान आवश्यक हैं। हम पत्रिका में संस्कृत का आधारभूत ज्ञान देने के लिए क्रमिक रूप से निर्मित पाठ प्रस्तुत कर रहे हैं जिनके द्वारा बिना अध्यापक की सहायता के अपने प्रयास से संस्कृत सीखी जा सकती है।

वेद. वेद मनुष्य जाति के सबसे प्राचीन ग्रंथ हैं, भारतीय चिन्तन और संस्कृति के आधार हैं। इस प्रसंग में हम वेदों के मूल मंत्रों, उनके शब्दार्थ और व्याख्या के साथ वैदिक ऋषियों के विभिन्न विषयों पर चिन्तन से परिचित हो रहे हैं। अंक 1 से 12 तक वेद में परमात्मा के स्वरूप विषय पर 54 मंत्र हमने पढ़े हैं। इस समय वैदिक प्रार्थनाएँ विषय पर वेदों के मंत्रों का अध्ययन चल रहा है।

योग. भारतीय चिन्तन की गहराई को बिना साधना के नहीं समझा जा सकता। साधना-पद्धति में योग का प्रमुख स्थान है और उसके विषय में पतंजलि का योग-सूत्र सर्वमान्य पुस्तक है। पत्रिका में हम योग-सूत्र पर चुने हुए सूत्रों का शब्दार्थ और व्याख्या के साथ अध्ययन कर रहे हैं।

प्रश्न-चर्चा. प्रत्येक अंक में पाठकों द्वारा पूछे गए प्रश्नों पर बिना किसी आग्रह के मुक्त चर्चा होती है।

गीता-सार. गीता के मुख्य विषयों पर चुने हुए 150 श्लोकों में गीता के दर्शन का सार प्रस्तुत किया गया है। इसकी भूमिका सांख्य दर्शन की पृष्ठभूमि में गीता को हृदयंगम करने में सहायक है।