संधान एक छोटा-सा संगठन है जिसका प्रमुख उद्देश्य मानव जीवन के मूल स्वरूप को समझकर उसके अनुसार उपयुक्त जीवन-शैली का विकास करना है। हमारा विश्वास है कि इस कार्य में भारतीय चिन्तन से सर्वाधिक सहायता मिल सकती है। कारण, मानव जीवन की समस्याओं को भारत में जितनी गहराई के साथ देखा, समझा और सुलझाया गया है वैसा अन्य संस्कृतियों में संभव नहीं हो सका है।
वर्तमान युग अनुसंधान यानी रिसर्च का युग है। आज जब भी कोई समस्या हमारे सामने आती है हम उस पर रिसर्च करके उसका हल ढूँढने का प्रयास करते हैं। बाहरी जगत् की समस्याओं के क्षेत्र में विज्ञान और टेक्नालाजी के अनुसंधान के द्वारा समस्याओं को हल करने में अपार सफलता मिली है जिसका लाभ हम सभी उठा रहे हैं।
पर मनुष्य के आंतरिक जीवन की समस्याएँ बाहर के जीवन की समस्याओं से सर्वथा भिन्न हैं। मनुष्य बाहरी जीवन में कितनी ही प्रगति क्यों न कर ले, जब तक वह अपने जीवन के आंतरिक स्वरूप को नहीं जानेगा, अंधकार में ही भटकता रहेगा। विज्ञान के द्वारा उसे अपने जीवन को समझने में कोई सहायता मिलनेवाली नहीं है। वर्तमान समय के पश्चिम के सबसे प्रसिध्द दार्शनिक लुडविग विटगैंस्टाइन ने कहा है, ''यदि विज्ञान में सभी संभव प्रश्नों का उत्तार मिल भी जाए तो भी जीवन की समस्याओं को उसने छुआ भी नहीं होगा।'' हमें जीवन की समस्याओं को समझने और सुलझाने के लिए अवश्य ही रिसर्च के बजाय सर्च अनुसंधान के बजाय संधान का मार्ग अपनाना पड़ेगा।
पर संधान का अर्थ केवल आंतरिक खोज ही नहीं है। इसमें खोज के साथ सुधार भी सम्मिलित है। समस्याओं के बारे में केवल चर्चा करते रहने से कोई लाभ नहीं जब तक उन्हें सुलझाने का सार्थक प्रयास न किया जाए। संधान की सामग्री इसी दृष्टि से तैयार की जा रही है कि वह विचार देने के साथ-साथ कर्म की भी प्रेरणा और आवश्यक मार्गदर्शन दे सके।
यह बहुत गलत धारणा है कि भारतीय विचारधारा मुख्यत: धार्मिक रही है। भारतीय परंपरा में धर्म, मनोविज्ञान और दर्शन में कोई अंतर नहीं किया गया। भारत में जीवन को समेकित रूप में देखने की परंपरा रही है। यह समेकित दृष्टि अब पश्चिम के कुछ दार्शनिकों में भी दिखाई देने लगी है।

भगवद्गीता शाश्वत दर्शन का अब तक प्रस्तुत एक सबसे स्पष्ट और सर्वांगीण सार है। इसलिए न केवल भारतीयों के लिए अपितु पूरी मानव जाति के लिए इसका स्थायी महत्व है।

एल्डस हक्सले