संधान संस्कृत-प्रवेश की ओर से....
संस्कृत का अध्ययन आरम्भ करने वाले छात्रों के लिए संधान संस्कृत प्रवेश पाठ्यक्रम प्रस्तुत करते हुए हमें बहुत प्रसन्नता हो रही है। हम सन् 1992 से अपने छात्रों के लिए हिन्दी, अंग्रेजी और जापानी भाषाओं के माध्यम से पत्राचार पाठ्यक्रम चला रहे हैं। इस पाठ्यक्रम का विकास क्रमिक रूप से हुआ है। इन वर्षों में हमने छात्रों को प्रभावी ढंग से संस्कृत पढ़ाने के लिए कई विधियों का परीक्षण किया। अन्ततः हम एक ऐसा आधारभूत पाठ्यक्रम तैयार कर सके हैं जिसका उपयोग छात्र अध्यापकों से कक्षा में पढ़ने के लिए अथवा घर में स्वयं शिक्षक के रूप में कर सकते हैं। इस पाठ्यक्रम की कुछ विशेषताएँ निम्नलिखित हैं।
1. पाठ्यक्रम के प्रथम के दो पाठों में देवनागरी लिपि की संस्कृत से संबंधित कुछ बातों की ओर ध्यान दिलाया गया है जिसे संस्कृत का अध्ययन आरम्भ करने वालों के लिए जानना आवश्यक है।
2. पाठ्यक्रम में संस्कृत व्याकरण के बजाय संस्कृत भाषा सिखाने पर बल दिया गया है। प्रायः संस्कृत की प्रारम्भिक पुस्तकों में व्याकरण की रूपावलियों और नियमों को सिखाने पर बल रहता है जिससे संस्कृत भाषा में अन्तर्दृष्टि नहीं मिलती। इस पाठ्यक्रम के छात्र यह अनुभव करेंगे कि वे आरम्भ से ही वास्तविक संस्कृत भाषा के संपर्क में आ रहे हैं और जैसे-जैसे उनका पाठ्यक्रम आगे बढ़ेगा वैसे-वैसे उनका संस्कृत भाषा से अधिकाधिक परिचय होता जाएगा। उन्हें संस्कृत भाषा बोझ नहीं लगेगी अपितु इसके सीखने में उन्हें आनन्द आने लगेगा। भाषा के साथ ही व्याकरण को भी समुचित महत्त्व दिया गया है और व्याकरण के नियमों को क्रमिक रूप से सिखाया गया है।
3. प्रायः संस्कृत शिक्षण में यह माना जाता है कि आरम्भ में ही छात्रों को संज्ञाओं और धातुओं की रूपावलियाँ रटा दी जाएँ। इससे भाषा शिक्षण एकदम अरुचिकर और उबाऊ हो जाता है। हमने अपने पाठ्यक्रम का निर्माण इस ढंग से किया है कि छात्रों को संज्ञाओं और धातुओं के रूपों को रटना न पड़े। हम छात्रों से बार-बार कहते हैं कि वे संज्ञा रूपों और धातु रूपों के रटने में समय बरबाद न करें, इसके बजाय हम उन्हें सलाह देते हैं कि वे संस्कृत के वाक्यों, कहानियों, श्लोकों को बार-बार पढ़े। इस प्रकार वे नियमों को सहजरूप में आत्मसात् कर लेते हैं और उन्हें स्मरण करने के लिए उन्हें किसी प्रकार का अतिरिक्त प्रयास नहीं करना पड़ता।
4. इस पाठ्यक्रम में विषयवस्तु को भी क्रमिक रूप से प्रस्तुत किया गया है। व्याकरण का अनावश्यक विस्तार नहीं दिया गया है। व्याकरण के शिक्षण-बिन्दुओं को इस प्रकार प्रस्तुत किया गया है कि छात्र आरम्भ से ही वास्तविक संस्कृत वाक्यों को पढ़ना शुरू कर देते हैं वे स्वयं संस्कृत के वाक्य बनाने लगते हैं। सभी पाठों को छोटे-छोटे सुविधाजनक खंडों में विभाजित किया गया है। तीसरे पाठ के बाद से पाठ के प्रत्येक खंड के आरम्भ में उस खंड में पढ़ाए जाने वाले विषय के संकेत के लिए सं (संझा), वि. (विशेषण), क्रि. (क्रिया) आदि अक्षर दिए गए हैं ताकि उस खंड का विषय एक दृष्टि में ही पता चल जाए।
5. किसी भाषा को सीखने के लिए अभ्यास का विशेष महत्त्व होता है। प्रत्येक पाठ में पर्याप्त अभ्यास दिए गए हैं जिनके उत्तर पाठ के अंत में दे दिए गए हैं ताकि छात्र अपने द्वारा किए गए अभ्यासों का मिलान किसी बाहरी सहायता के बिना स्वयं कर सकें। अतिरिक्त अभ्यास के लिए अभ्यास पुस्तिकाएँ तैयार करने की भी योजना है ताकि छात्रों को संस्कृत भाषा और व्याकरण को और अधिक अच्छी तरह समझने में अतिरिक्त सहायता मिल सके।
6. इस पाठ्यक्रम में संस्कृत भाषा के बोलचाल के रूप को भी सिखाने पर विशेष बल दिया गया है। आज यद्यपि बोलचाल के लिए संस्कृत का व्यवहार करने वाले लोगों की संख्या बहुत अधिक नहीं है, पर संस्कृत अभी पूर्णतया जीवन्त भाषा है क्योंकि संस्कृत भाषा में पाए जाने वाले विचार आज भी जन सामान्य की विचार धारा और जीवन पद्धति को प्रभावित करते हैं आगे भी ऐसा करते रहेंगे। कोई भी भाषा हमारे कानों और वाकयंत्र के माध्यम से हमारे अन्तःकरण में प्रवेश करती है। इसलिए इस पाठ्यक्रम में शुद्ध उच्चारण और मौखिक अभ्यास पर विशेष बल दिया गया है। आरम्भ से ही शब्दावली और वाक्यों के अभ्यास के लिए सरल वार्तालाप-अभ्यास दिए गए हैं। इससे उनमें संस्कृत भाषा का व्यवहार करने का आत्मविश्वास पैदा होता है। संस्कृत में श्लोकों के गायन का विशेष महत्त्व है। अधिकांश पाठों में चुने हुए श्लोक दिए गए हैं। छात्रों को इनके गायन के लिए प्रोत्साहित किया गया है।
7. अनुच्छेदों के नीचे नए संस्कृत शब्दों के अर्थ दिए गए हैं। पाठों के अन्त में सभी पाठों के कठिन शब्दों की शब्दावली दे दी गई है। जो अपरिचित शब्दों का अर्थ जानने में आपकी सहायता करेंगे।
8. संस्कृत भाषा अन्य सैकड़ों भाषाओं के समान ही एक भाषा मात्र नहीं है। इस भाषा में गहनतम आध्यात्मिक और बौद्धिक विचारों की परम्परा सुरक्षित है। संस्कृत के छात्र केवल संस्कृत भाषा ही सीखना नहीं चाहते अपितु वे इसमें अभिव्यक्त विचारों को भी जानना और आत्मसात् करना चाहते हैं। इस प्राचीन भाषा में कुछ ऐसे गहनतम और कालनिरपेक्ष विचार हैं जो विश्व में अन्यत्र कहीं भी उपलब्ध नहीं है। इस प्रारम्भिक पाठ्यक्रम का निर्माण करते समय हमने इस बात का ध्यान रखा है कि छात्र इन गहनतम विचारों से परिचित हो सकें। हमें आशा है इस प्रारम्भिक पाठ्यक्रम को समाप्त करने के बाद छात्र भगवद् गीता, उपनिषदों के कुछ भागों को स्वयं पढ़ सकेंगे।
इस पाठ्यक्रम में और सुधारों के लिए छात्रों एवं अध्यापकों के सुझावों का स्वागत होगा।


अनिल विद्यालंकार

 
पाठ्यक्रम की विषय-सूची
 

पाठ-1

देवनागरी लिपि के स्वर और व्यंजन, ध्वनियों का वर्गीकरण, शुद्ध उच्चारण का महत्त्व।

1

पाठ-2

अकारान्त शब्दों में ‘अ’ का उच्चारण, संयुक्ताक्षरों के विभिन्न रूप, नासिक्य ध्वनियाँ, संयुक्ताक्षरों के पुराने रूप, संस्कृत वाक्य, प्रार्थना।

7

पाठ-3

अकारान्त पुंलिंग, नपुंसकलिंग और आकारान्त स्त्रीलिंग संज्ञाओं तथा अस्मद्, युष्मद, तद्, एतद् सर्वनामों के प्रथमा (कर्ताकारक) और षष्ठी विभक्ति (संबंध कारक) के रूप।

13

पाठ-4

अस् धातु के लट् लकार के रूप, शरीर के अंगों के संस्कृत नाम, संस्कृत के विशेषण, ‘हाँ-नहीं’ उत्तरवाले प्रश्न, ‘च’ का प्रयोग, कुछ स्थानवाचक अव्यय।

19

पाठ-5

गण की धातुओं का लट् लकार; अकारांत पुंलिंग और नपु. लिंग तथा आकारांत स्त्री. संज्ञाओं की द्वितीया विभक्ति; सर्वनाम भवत् की प्रथमा और षष्ठी विभक्ति, एक वार्तालाप।

25

पाठ-6

अस्मद्, युष्मद् तथा तद्, एतद्, किम्, यद् और सर्व की द्वितीया विभक्ति, संस्कृत वाक्यों में शब्द-क्रम, भू-गण की कुछ और धातुएँ, यद् और तद् के बीच सह-संबन्ध, समयवाचक अव्यय।

31

पाठ-7

अकारांत पुंलिंग व नपु. लिंग और आकारांत स्त्रीलिंग संज्ञाओं तथा सर्वनामों के तृतीया, चतुर्थी और पंचमी विभक्तियों के रूप; एक वार्तालाप।

37

पाठ-8

दिव् गण की धातुए और कृ धातु के वर्तमान काल (लट् लकार) के रूप, संधि के कुछ नियम, संस्कृत के तीन श्लोक, एक पत्र।

43

पाठ-9

अकारान्त पुंलिंग व नपु. लिंग और आकारान्त स्त्रीलिंग संज्ञाओं और सर्वनामों के सप्तमी और संबोधन के रूप तथा पूरी रूपावली।

49

पाठ-10

तुद्-गण और चुर्-गण की धातुएँ, धातुओं का अ-वर्ग, स्वर संधि के कुछ नियम, एक वार्तालाप और श्लोक।

55

पाठ-11

उकारान्त और इकारान्त पुंलिंग संज्ञाएँ, इदम् और स्व सर्वनामों के रूप, भूतकाल (लङ् लकार)।

61

पाठ-12

चित् और स्म निपात; संधि का एक नियम, तस्(त:) प्रत्यय, निजवाचक 'स्वयम्'; सिंह-शशकयो: कथा; एक वार्तालाप और दो श्लोक

67

पाठ-13

ईकारान्त और ऊकारान्त तथा इकारान्त और उकारान्त स्त्रीलिंग संज्ञाओं के रूप; आत्मनेपद में वर्तमान काल (लट् लकार) और भूतकाल (लङ् लकार) के रूप।

73

पाठ-14

इकारान्त और उकारान्त नपुं. लिंग संज्ञाओं, विशेषणों और एक से दस तक संख्याओं के रूप, स्वर संधि, एक वार्तालाप, दो श्लोक।

79

पाठ-15

लोट् लकार एवं विधिलिङ्; कथा-लोभस्य फलम्, प्रार्थना के दो श्लोक।

85

पाठ-16

सामान्य भविष्यत् काल (लृट्); धातुओं के सेट् और अनिट् वर्ग, कर्तृवाच्य से कृत् प्रत्यय; त्वा, य, 'चतुर: वानर:' कथा।

91

पाठ-17

कृदन्त तुम् प्रत्यय, कर्मवाच्य, सप्ताह के दिन, समय और ऋतु वाचक शब्द, दिशाओं के नाम, पूरण संख्याएँ, कथा- 'दशम: त्वमसि'।

97

पाठ-18

ऋकारान्त संज्ञाओं के रूप; भाववाच्य; कृत प्रत्यय- तव्य, अनीय, य; एक संवाद, कथाऱ 'भर्तृहरे: वैराग्यम्'।

103

पाठ-19

व्यंजनांत पुंलिंग और स्त्रीलिंग संज्ञाएँ तथा विशेषण; सम्राट् अशोक की कहानी, गीता के चार श्लोक।

109

पाठ-20

व्यंजनांत नपुंसंक लिंग संज्ञाएँ और विशेषण, कर्मवाच्य का कृत् प्रत्यय त और कर्तृवाच्य का कृत् प्रत्यय तवत्, मित्र को पत्र।

115